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मां की ममता और पिता की क्षमता का जो पुत्र आकलन करने लग जाए वह पुत्र नहीं हो सकता – पंडित कृष्णकांत शास्त्री

भास्कर न्यूज़ 24/ वीरेंद्र भारद्वाज/ दल्लीराजहरा। ग्राम कुसुमकसा में पूर्व जनपद सदस्य संजय बैस एवं  बैस परिवार के द्वारा आयोजित श्रीमद भागवत ज्ञान यज्ञ का आयोजन अपने पूज्य पिता जी स्व. जयपाल बैस के प्रथम पुण्यतिथि में किया गया है । यह आयोजन 16 दिसम्बर से 24 दिसम्बर तक किया जाएगा। श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह के भागवत आचार्य हैं पंडित कृष्णकांत शास्त्री ( कवर्धा वाले ) हैं। कथा के तीसरे दिन उन्होंने बताया कि भगवान की कृपा से दुश्मन को भी दोस्त बनाया जा सकता है यदि भगवान की कृपा हो तो पर्वत को भी लांघा जा सकता है । भगवान से प्रेम से अपने पुत्र अपने पिता अपनी मां और अपनी बेटी की तरह करना चाहिए जिससे अपने जीवन का उद्देश्य सफल हो सके ।
शास्त्री जी ने बताया कि यह शाश्वत है कि जैसे बोओगे वैसा ही पाओगे । आप जिस तरह लोगों के साथ व्यवहार ( प्रेम ) करोगे तो आपको प्रेम ही मिलेगा हो सकता है इसमें कुछ समय लगे ,लोग आपको समझने में देरी करें लेकिन अंत में आपको आपका कर्म का फल अवश्य प्राप्त होगा ।
भगवान से मांगना हो तो ऐसे मांगना जैसे धृति महाराज ने मांगा आपकी तरह मेरा बेटा हो मनु महाराज ने भी मांगा भगवान आप जैसे ही मेरा बेटा हो बस इसी तरह भगवान उनका बेटा बन कर आया । यह कथा प्रारंभ होती है उस समय से जब तीनों देवियों को मां अनुसूया से ईर्षा हो गई । मां लक्ष्मी को धन का मां सरस्वती को ज्ञान का और मां अन्नपूर्णा अपने रूप का अहंकार आ गया था ।उनके अहंकार को देखकर तीनों देवताओं ने विचार किया कि इनके अहंकार को दूर कैसे किया जा सके । एक बार नारद मुनि अनसूया के कुटिया में गए मां ने उन्हें आसन पर बैठा कर सुंदर भोजन करवाया । उसके बाद नारद मुनि स्वर्ग में गए तो वहां मां अन्नपूर्णा ने उन को भोजन कराया तब नारद जी खाते जाते और मुंह सिकोड़ते जाते । माताऐं बोली क्यों नारद भोजन में क्या स्वाद नहीं है तब नारद बोले आपका भोजन बहुत स्वादिष्ट है लेकिन इसमें उस तरह का स्वाद नहीं है जितना मां अनुसूया के भोजन में होता है । मां बोली नारद जानते हो मैं कौन हूं मैं तुम्हारी जननी हूं और मेरा भोजन में आज तुमको स्वाद नहीं आ रहा है महाराज ने कहा मां के हाथों को भोजन सभी के नसीब में नहीं होता है । जिनकी किस्मत में होता है उनका जीवन सफल हो जाता है कहा जाता है मां के हाथों का भोजन ब्राह्मण के हाथों का तिलक और पुत्र के हाथों से पिंडदान हर किसी के भाग्य में नहीं रहता । इसलिए कितना भी पेट भरा रहे यदि मां भोजन करने को कहती है तो जरूर खाएं भले ही थोड़ा सा खाएं मां की बातों का अवहेलना ना करें । मां के हाथों का भोजन अमृत है मां के आंचल में ही स्वर्ग हो जाता है मां जब बच्चों के सिर में हाथ फेरती है तो उसने स्वर्ग का आनंद की अनुभूति होती है ।
इसी तरह नारद मुनि ने कैलाश पर्वत विष्णु लोक सभी जगह मां पार्वती और दूसरों के भोजन को स्वादहीन बताया तब सभी देवियों ने मां अनुसूया की परीक्षा लेने की सोची ।
उन्होंने तीनों देवताओं को भिक्षा मांग कर लाने को भेजे तीनों देव अन्न पात्र लेकर साधु के वेश में मां अनसूया की कुटिया में भिक्षा मांगने गए । तीनों देवताओं को देखकर सती अनसूया प्रसन्न हुई और उन्होंने भिक्षा देने के लिए अन्न ले कर बाहर निकली । तब तीनों देवताओं ने कहा माता हमारा अभि व्रत चल रहा है यदि आप निर्वस्त्र होकर दान करेंगे तभी हम भिक्षा ग्रहण करेंगे । मां अनुसूया ने अपनी पतिव्रता धर्म से साधुओं की बात को समझ गई उन्होंने महसूस किया कि यह साधारण साधु न होकर तीनों देव हैं जो उनका परीक्षा लेने के लिए उनकी कुटिया में आए हैं । तब उन्होंने अपने सतीत्व बल से तीनों साधु को नन्हे बालक के रूप में परिवर्तन कर दिया और उनकी सेवा में लग गए । बहुत दिनों तक जब तीनों देव अपने अपने लोक नहीं पहुंचे तब तीनों देवियों ने नारद मुनि से पूछा की वह कहां है तब उन्होंने मां अनुसूया के कुटिया की ओर इशारा किया । जब तीनों देवियां उनके कुटिया में पहुंचे तो देवता गण मां अनसूया के बालक बनकर उनके पालने में झूल रहे थे । मां अनसूया तीनों देवियों को अपने कुटिया में बिठाया अंत में तीनों देवियां अनसूया के सतीत्व के आगे नतमस्तक हो गई और उन्होंने कहा हमें अपने ज्ञान रूप और धन का अहंकार हो गया था आपके ज्ञान और सतीत्व के आगे हम तीनों नतमस्तक हो गए ।शास्त्री जी ने पुत से कपूत बनने के संबंध में एक कथा बतलाया उन्होंने कहा कि आज हमारे समाज में परिवर्तन हो रहा है उन्होंने एक मां की कथा बताई एक आंख वाली एक मां अपने बेटे को पढ़ा लिखा कर नौकरी के लायक बनाया जब उन्होंने अपने बेटे का विवाह किया । विवाह होने के बाद उनके यहां आने वाली बहू ने अपने पति से कहा कि आपकी मां के कारण लोग हमें उलाहना देते हैं की कानी की बहू है ।
इसे घर से बाहर निकाल दो बेटे ने अपनी पत्नी की बात मानकर अपने मां को घर से बाहर निकाल देता है । मां भटकते भटकते मौत की नींद में सो जाती है । मरने से पहले एक पत्र अपने बेटे के लिए भेजती है जब उन्हें अपनी मां की मृत्यु की खबर मिलता है तब वह अपने मां के मिलने जाता है पत्र में लिखा रहता है कि बेटे जब तुम ने जन्म लिया तब तुम्हारा एक आंख खराब था मैंने अपना आंख देकर तुम्हें रोशनी दिया था । जिसके कारण मैं आज कानी हुई हूं । यह बात मैंने वर्षों पहले तुमसे छुपाई थी लेकिन आज मौत से पहले मैं सच्चाई तुम्हें बता देना चाहती हूं । बेटा को जब पता चला तो वह फूट फूट कर रोया लेकिन मां तो इस दुनिया से चली गई थी वह वापस नहीं आ सकती थी।

शास्त्री जी ने देवी अनसूया चरित्र कथा के साथ शिव पार्वती विवाह की कथा भी बताई । जहां देवाधिदेव महादेव एवं जगत जननी मां पार्वती के विवाह का सुंदर एवं सचित्र चित्रण किया गया l

कथा के समाप्ति के तीसरे दिन भागवताचार्य पंडित कृष्णकांत शास्त्री जी ने बताया कि मां की ममता और पिता की क्षमता का जो आकलन करने लग जाए वह पुत्र नहीं हो सकता वह कुपुत्र होता है मां और पिता का ऋण आप जीवन में कभी भी नहीं उतार सकते ।

वीरेन्द्र भारद्वाज

चीफ़ एडिटर, भास्कर न्यूज़ 24

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